क्यों मनाया जाता है Chhath Puja

छठ पूजा चार दिनों तक चलने वाला एक कठिन त्योहार है। सर्दी के मौसम में जब कोई आप पर दो बूंद पानी डालता है तो ऐसा लगता है कि किसी ने चाबुक मार दी है, लेकिन उपवास करने वाले को घंटों ठंडे पानी में खड़े रहकर ध्यान करना होता है।

छठ पर्व के पहले दिन को नहाय खाय कहा जाता है। छठ पर्व का संकल्प लेते हुए अपने हाथों से भोजन तैयार करना होता है। खाने में अरवा यानी कच्चे चावल, कद्दू और सरसों के साग की सब्जी बनानी होती है और यह भोजन पूरे दिन में रात में एक बार ही खाना होता है।

छठ पर्व के पहले दिन को नहाय खाय कहा जाता है। छठ पर्व का संकल्प लेते हुए अपने हाथों से भोजन तैयार करना होता है। खाने में अरवा यानी कच्चे चावल, कद्दू और सरसों के साग की सब्जी बनानी होती है और यह भोजन पूरे दिन में रात में एक बार ही खाना होता है।

अब दूसरे दिन यानी कार्तिक शुक्ल पंचमी तिथि को खरना किया जाता है. इस दिन भी व्रत करने वाले को एक ही भोजन करना होता है, वह भी प्रदोष काल में यानी सूर्यास्त के बाद। 

भक्त अपने हाथों से गुड़, दूध और चावल से खीर बनाते हैं। इसके साथ ही केले के पत्तों पर ठेकुआ और मिठाई भी बनाकर छठ मैया को चढ़ाते हैं. इस प्रसाद का सेवन व्रत के द्वारा किया जाता है और इसके बाद वे 36 घंटे तक बिना कुछ खाए-पिए उपवास करते हैं।

छठ पर्व के तीसरे दिन यानी आज कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को ही मुख्य रूप से छठ कहा जाता है क्योंकि इसी दिन छठी मैया यानी षष्ठी देवी को प्रथम अर्घ्य दिया जाता है।

इस दिन छठ मैया को भेंट करने के लिए व्रती अपने हाथों से पकवान और मिठाइयां बनाते हैं। दोपहर के बाद से छठ मैया का डाला तैयार किया जाने लगता है और फिर छठ घाट जाने की तैयारी हो जाती है।